यूं तो हम बचपन से ही सुनते आये हैं ये कहावत, लेकिन मायने बचपन बीत जाने के बाद पता चलते हैं , हमारे मस्तिष्क में लाठी की और भैंस की तस्वीर बचपन से ही चस्पा हो जाती है, बचपन बीतते बीतते समय और परिस्थितयां बदलती हैं इसके साथ ही लाठी और भैंस भी, हमें पता है कि जिसकी मज़बूत लाठी होगी उसकी भैंस भी दमदार होगी, लेकिन परेशानी तब आती है जब लाठी का मालिक बदलता है और भैंस वही की वही रहती है, बात सुनने में तो अजीब सी लगती है लेकिन है बिलकुल सही, क्योकि अमूमन देखा ये जाता है की मालिक भैंस का बदलता है लाठी का नहीं, परन्तु ये तो असली लाठी और भैंस के बारे में होता है, हम अगर कहावत के रूप में स्थान, परिस्थिति और वस्तु को देखें तो मालिक लाठी का ही बदलता है,
हाँ हम परेशानी की बात कर रहे थे, क्योकि जब लाठी का मालिक बदलता है तो लाठी के पुराने मालिक को बड़ी तकलीफ होती है, क्योंकि उसके हाथ से लाठी ही नहीं भैंस भी निकल जाती है. अगर लाठी का पुराना मालिक सुहृदय और भलेमानस हो तो नए मालिक को कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन यदि लाठी बदल जाने के बाद भी पुराना मालिक अपना मलिकपन न छोड़ पाये तो फिर वो हर तरह से नए मालिक को परेशान करने की जुगत में लगा रहेगा, और तो और वो भैंस की पूँछ भी यदा कदा मरोड़ देगा जिससे भैंस को परेशानी होगी साथ ही साथ नए मालिक को भी.
उपरोक्त बातों को किसी भी परिप्रेक्ष्य से जोड़ कर देखा है, चाहे वो सामाजिक हो या राजनीतिक।
हाँ हम परेशानी की बात कर रहे थे, क्योकि जब लाठी का मालिक बदलता है तो लाठी के पुराने मालिक को बड़ी तकलीफ होती है, क्योंकि उसके हाथ से लाठी ही नहीं भैंस भी निकल जाती है. अगर लाठी का पुराना मालिक सुहृदय और भलेमानस हो तो नए मालिक को कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन यदि लाठी बदल जाने के बाद भी पुराना मालिक अपना मलिकपन न छोड़ पाये तो फिर वो हर तरह से नए मालिक को परेशान करने की जुगत में लगा रहेगा, और तो और वो भैंस की पूँछ भी यदा कदा मरोड़ देगा जिससे भैंस को परेशानी होगी साथ ही साथ नए मालिक को भी.
उपरोक्त बातों को किसी भी परिप्रेक्ष्य से जोड़ कर देखा है, चाहे वो सामाजिक हो या राजनीतिक।