शनिवार, 26 नवंबर 2016

इधर नोट बंदी उधर विपक्ष की जुगल बंदी

मोदी जी के 8 /11 के ऐतिहासिक नोटबंदी के साहसिक फैसले के बाद जहां सम्पूर्ण भारत में समस्त देशभक्त मोदी जी के साथ खड़े दिखाई देते हैं वहीं कुछ गिनती के ऐसे लोग भी हैं जो अपना काला धन डूबते हुए देखकर मोदी जी को तहे दिल से कोस रहे हैं, उन्हें ये सपने में भी इस बात का अंदाजा नहीं था कि  मोदी जी इस तरह का फैसला भी ले सकते हैं, जिस रात मोदी जी ने ये फैसला लिया था उसी दिन काली कमाई करने  वाले लोगों ने अपने काले धन को सफ़ेद करने की कार्यवाही शुरू कर दी, अरबों का घोटाला करने वालों की नींद उडी हुई है, और वे सभी लोग मोदी जी के खिलाफ लामबंद हो चुके हैं फिर चाहे उनके आपस में कितने भी मतभेद हों, 
मोदी जी ने एक तीर से कई निशाने साधे हैं , चाहे वो भ्रष्टाचार हो, चाहे आतंकवाद हो या नकली नोटों का कारोबार, सभी देश विरोधी हरकतों को गहरी चोट पहुँची है, देश विरोधी ताकतों में हड़कंप मचा  हुआ है.

क्रमशः

बुधवार, 23 मार्च 2016

राष्ट्र या स्वराष्ट्र

एक राजनीतिक दल को देश पर राज करते हुए कई दशक हो गए तो वह दल अपने आप को ही राष्ट्र समझ बैठा व उसके नेता अपने आप को राष्ट्रवादी, उनकी विचार धारा इतनी कुंठित हो गयी की उन्हें अपने और अपने दल के अलावा और कोई भी दल राष्ट्र विरोधी लगने लगा, हद तो तब हो गई जब उस दल से जुड़े अन्य दल भी अपने आप को उस राष्ट्र का हिस्सा समझने लगे. जैसे कुएँ का मेंढक सिर्फ अपने आसपास के पानी को ही पूरी दुनिया समझ बैठता है, 
चुनावों के बाद देश पर विपक्ष के नेता को राजगद्दी पर बैठे देख कर तो उस दल को तो ये बात बिलकुल भी हजम नहीं हो पा रही है, चूंकि विपक्ष का नेता अब सत्ताधारी है और वे अब विपक्ष की सूची में भी पूरी तरह नहीं आ पा रहे है, उस पर देश का वर्तमान नेता इतने प्रभावशाली व सामर्थ्यवान व्यक्तित्व का मालिक है जितना कि वर्तमान विपक्ष के कोई भी भूतपूर्व  नेता आज तक नहीं हुआ. अब उस पर वर्तमान विपक्ष को परेशान करने वाली बात ये कि  सत्ताधारी दाल के नेता को सरकार संभाले हुए डेढ़ साल से  ज़्यादा हो गए लेकिन अब तक उन्हों ने ऐसी कोई भी गलती नहीं की जिसपर की वर्तमान विपक्ष कोई ऊँगली उठा सके,  इलाज भी वर्तमान विपक्ष ने ढूंढ लिया, अब ये ठान लिया गया की कोई गलती हो या न हो, हमें शोर मचाना है जिससे की वर्तमान सरकार कोई भी काम न कर सके. 
अब वर्तमान विपक्ष जो अपने मानसिक असंतुलन की वजह से अपने आप को राष्ट्र मान चुका  है  तो उसके वर्तमान नेता का ये कहना की राष्ट्र भक्ति उनके खून में बसी हुई है, कोई गलत बात नहीं है, अब अपने दल के अलावा तो सभी दल राष्ट्र विरोधी हैं क्योंकि वे स्वयं ही राष्ट्र है, और इसी वजह से उन्हें लगता है की चुनावों से हार की वजह से उनका देश निकाला हो गया है, ये बात उनके अंतर्मन में बुरी तरह बैठ चुकी है इसीलिए जहां कहीं भी उन्हें कोई भी व्यक्ति आजादी आजादी चिल्लाता हुआ नज़र आता है वह उन्हें अपना सा नज़र आने लगता है उन्हें लगता है कि  यही उनका 'भगत सिंह' है जो उन्हें वर्तमान सत्ताधारी सरकार से आज़ादी दिलवा सकता है. 
अब तो पूरे देश को ही यह निर्णय करना है 




सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

असहिष्णुता या दिमागी फितूर

आज कल एक शब्द बहुत सुनने में आ रहा है, असहिष्णुता  इस शब्द का आविष्कार तो हालांकि युगों पहले हो चुका था लेकिन प्रचलन में अभी कुछ ही समय पहले आया है, और गाहे बेगाहे इसका इस्तेमाल हो ही रहा है,  लगता है जैसे की इस कि  इस शब्द का पुनर्जन्म हुआ हो या फिर पता नहीं कहाँ से भटकता हुआ यहां की आबोहवा में फैलने की कोशिश कर रहा हो।  
वैसे तो इस  शब्द के मायने साधारण से  हैं, लेकिन कुछ लोग इसको ऐसे असाधारण बनाने की जुगत में लगे हैं, मानो ये ऋषि दधीचि की अस्थियों से बना अजेय अस्त्र हो. कुछ लोग इसको चमका चमका कर अधिकतर लोगों को डराने की कोशिश में हैं, जिससे की उनकी दुकानदारी चलती रहे, इन कुछ लोगों की भभकियों के फेर में कुछ लोग आ भी जाते हैं, लेकिन अधिकतर लोगों को इस शब्द से कुछ फर्क नहीं पड़ता क्योंकी सहन करने की क्षमता हम लोगों को घुट्टी में पिलाई जाती है।  
सैंकड़ों वर्षों से विदेशी आक्रमणकारी इस देश में आते रहे, लूटते रहे, और लूट लूट कर जाते रहे, लेकिन हमारी सहष्णुता देखो हमने कभी किसी देश पर आक्रमण नहीं किया बल्कि उनमे से कइयों को तो हमने अपने देश में बसने दिया और उनकी और हमारी संस्कृतियों को घुलमिल जाने दिया इस से बड़ी सहिष्णुता और क्या होगी।  
आज भी देश में हम उन गिनती के लोगों को सहे जा रहे हैं जो असहिष्णुता नामक ज़हर से इस देश की मिटटी को प्रदूषित करने की कोशश करने में लगे हैं। 


मंगलवार, 19 जनवरी 2016

जिसकी लाठी उसकी भैंस

यूं  तो हम बचपन से ही सुनते आये हैं ये कहावत, लेकिन  मायने बचपन बीत जाने के बाद  पता चलते हैं , हमारे मस्तिष्क में लाठी की और भैंस की तस्वीर बचपन से ही चस्पा हो जाती है, बचपन बीतते बीतते समय और परिस्थितयां बदलती हैं इसके साथ ही लाठी और भैंस भी, हमें पता है कि जिसकी मज़बूत लाठी होगी उसकी भैंस भी दमदार होगी, लेकिन परेशानी तब आती है जब लाठी का मालिक बदलता है और भैंस वही की वही रहती है, बात सुनने में तो अजीब सी लगती है लेकिन है बिलकुल सही, क्योकि अमूमन देखा ये जाता है की मालिक भैंस का बदलता है लाठी का नहीं, परन्तु ये तो असली लाठी और भैंस के बारे में होता है, हम अगर कहावत के रूप में स्थान, परिस्थिति और वस्तु को देखें तो मालिक लाठी का ही बदलता है,
हाँ हम परेशानी की बात कर रहे थे, क्योकि जब लाठी का मालिक बदलता है तो लाठी के पुराने मालिक को बड़ी तकलीफ होती है, क्योंकि उसके हाथ से लाठी ही नहीं भैंस भी निकल जाती है. अगर लाठी का पुराना मालिक सुहृदय और भलेमानस हो तो नए मालिक को कोई परेशानी नहीं होती,  लेकिन यदि लाठी बदल जाने के बाद भी पुराना मालिक अपना मलिकपन न छोड़ पाये तो फिर वो हर तरह से नए मालिक को परेशान करने की जुगत में लगा रहेगा, और तो और वो भैंस की पूँछ भी यदा कदा मरोड़ देगा जिससे भैंस को परेशानी होगी साथ ही साथ नए मालिक को भी.
उपरोक्त बातों को किसी भी परिप्रेक्ष्य से जोड़ कर देखा है, चाहे वो सामाजिक हो या राजनीतिक।