बुधवार, 23 मार्च 2016

राष्ट्र या स्वराष्ट्र

एक राजनीतिक दल को देश पर राज करते हुए कई दशक हो गए तो वह दल अपने आप को ही राष्ट्र समझ बैठा व उसके नेता अपने आप को राष्ट्रवादी, उनकी विचार धारा इतनी कुंठित हो गयी की उन्हें अपने और अपने दल के अलावा और कोई भी दल राष्ट्र विरोधी लगने लगा, हद तो तब हो गई जब उस दल से जुड़े अन्य दल भी अपने आप को उस राष्ट्र का हिस्सा समझने लगे. जैसे कुएँ का मेंढक सिर्फ अपने आसपास के पानी को ही पूरी दुनिया समझ बैठता है, 
चुनावों के बाद देश पर विपक्ष के नेता को राजगद्दी पर बैठे देख कर तो उस दल को तो ये बात बिलकुल भी हजम नहीं हो पा रही है, चूंकि विपक्ष का नेता अब सत्ताधारी है और वे अब विपक्ष की सूची में भी पूरी तरह नहीं आ पा रहे है, उस पर देश का वर्तमान नेता इतने प्रभावशाली व सामर्थ्यवान व्यक्तित्व का मालिक है जितना कि वर्तमान विपक्ष के कोई भी भूतपूर्व  नेता आज तक नहीं हुआ. अब उस पर वर्तमान विपक्ष को परेशान करने वाली बात ये कि  सत्ताधारी दाल के नेता को सरकार संभाले हुए डेढ़ साल से  ज़्यादा हो गए लेकिन अब तक उन्हों ने ऐसी कोई भी गलती नहीं की जिसपर की वर्तमान विपक्ष कोई ऊँगली उठा सके,  इलाज भी वर्तमान विपक्ष ने ढूंढ लिया, अब ये ठान लिया गया की कोई गलती हो या न हो, हमें शोर मचाना है जिससे की वर्तमान सरकार कोई भी काम न कर सके. 
अब वर्तमान विपक्ष जो अपने मानसिक असंतुलन की वजह से अपने आप को राष्ट्र मान चुका  है  तो उसके वर्तमान नेता का ये कहना की राष्ट्र भक्ति उनके खून में बसी हुई है, कोई गलत बात नहीं है, अब अपने दल के अलावा तो सभी दल राष्ट्र विरोधी हैं क्योंकि वे स्वयं ही राष्ट्र है, और इसी वजह से उन्हें लगता है की चुनावों से हार की वजह से उनका देश निकाला हो गया है, ये बात उनके अंतर्मन में बुरी तरह बैठ चुकी है इसीलिए जहां कहीं भी उन्हें कोई भी व्यक्ति आजादी आजादी चिल्लाता हुआ नज़र आता है वह उन्हें अपना सा नज़र आने लगता है उन्हें लगता है कि  यही उनका 'भगत सिंह' है जो उन्हें वर्तमान सत्ताधारी सरकार से आज़ादी दिलवा सकता है. 
अब तो पूरे देश को ही यह निर्णय करना है 




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